Monday, October 19, 2015

स्वामी विवेकानंद की बेहोशी

यक़ीनन बेहोशी अंधविश्वास, मान्यता, पागलपन जैसी इत्यादि बुराइयों की कारक  है। यह बेहोशी और भी खतरनक हो जाती है जब यह स्वामी विवेकानंद जैसे किसी पब्लिक फेस से जुड़ी हो। ऐसे में समर्थक बाह्य और अन्तः निकाय को सत्य के सापेक्ष न देखकर व्यक्ति विशेष या फिर मान्यता विशेष के सापेक्ष देखने लगते हैं और इस तरह बेहोशी और भी गहरी होती चली जाती है। कारण यह है कि लोगों का विश्वास एवं मान्यता कभी भी  एक सामान नहीं हो सकती है। ऐसे में लोग सत्य का साक्षी होने के बजाय अपनी मान्यता अनुसार किसी सत्य को झूठ मानते चले जाते हैं। ऐसा ही कुछ स्वामी विवेकानंद और उनके समर्थकों के साथ है।
यदि स्वामी विवेकानंद के अध्यात्म के क्षेत्र में किये गए कार्यों का विश्लेषण किया जाय तो हम पाएंगे कि किसी ने पुरानी शराब को नयी पैकिंग के साथ लोगों के बीच रख दिया हो जिसे पीकर लोगों का बेहोश होना अप्रत्याशित नहीं  है। कुछ दिन पूर्व एक न्यूज़ पेपर के सम्पादकीय पृष्ठ पर किसी ने शिकागों में संपन्न प्रथम विश्व सर्व धर्म सम्मलेन में स्वामी जी के सम्बोधन के उपरान्त किसी गृहस्थ के घर पर उसके द्वारा उठाये गए मूर्ति पूजा पर सवाल और उस पर स्वामी जी के हाज़िर जवाबी का उल्लेख ऐसे था जैसे किसी भिखमंगे को एक रूपये के सिक्के की जगह १००० रूपये का नोट मिल गया और वह उस व्यक्ति को सबसे बड़ा दानवीर मान बैठा हो दरअसल दोष न देने वाले का है  और न ही लेने वाले का। बल्कि दोष तो उस भिखमंगे की आदत का जिसके कारण वह खुद को अपाहिज, अपंग और दूसरों पर निर्भर होता चला जाता है। स्वामी जी के इसी वृतांत का जिक्र अभी कुछ रोज पहले अपने एक फेसबूकियें मित्र के एक पोस्ट पर किसी के कॉमेंट के रूप में देखा। अब इन भिखारियों को कोई कैसे समझाए कि इस संसार में ऐसे-ऐसे दानवीर पड़े हुए हैं जो अपने जीवन भर की कमाई को एक पल में लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं । किन्तु इस सत्य का साक्षी होने के लिए एक भिखारी के लिए जरुरी है कि वह अपनी माँगने की आदत से, अपनी मान्यता से, अपनी नीचता से बाज आते हुए सत्य को उस रूप में स्वीकार करें जैसा कि वह है
बहरहाल स्वामी विवेकानंद की उस हाज़िर जवाबी का बात करते हैं। किसी व्यक्ति द्वारा मूर्तिपूजा पर उठाये गए सवाल और उसके घर की दीवारों से लगी उसके पूर्वजों की तस्वीरों पर स्वामी जी ने पूछा कि अपने घर की दीवारों पर किनकी तस्वीरें लगा रखे हो और क्यों ? उस व्यक्ति ने कहा कि ये तस्वीरें उसके पूर्वजों की है और दीवारों पर इस लिए लगा रखा है क्योंकि अब वे इस दुनिया में नहीं है। अब ये तस्वीरें ही एक मात्र साधन है जिससे आने वाली पीढ़ियाँ अपने पूर्वजों के बारे में जान सकती है। उस पर स्वामी विवेकानन्द ने कहा जिस तरह से आप अपने पूर्वजों के इस दुनिया से गुजर जाने के बाद उन्हें  तस्वीरों और अपने मान्यताओं में मानते हैं। ठीक उसी प्रकार हम ईश्वर को मूर्ति रूप में मानते हैं। स्वामी जी के इस जवाब पर वह व्यक्ति निरुत्तर हो गया। उस व्यक्ति की मन की सीमा उतनी ही थी जिससे वह न आगे निकल पाया और न ही उसे तोड़ पाया। किन्तु स्वामी विवेकानन्द का यह कहना उनकी बेहोशी और बचपना नहीं तो क्या है क्योंकि उस व्यक्ति ने स्वामी जी को स्पष्ट बताया था कि अपने पूर्वजों के गुजरने के बाद उनकी तस्वीरों को उनकी जगह पर स्वीकारते हैं। स्वामी विवेकानन्द का ईश्वर की मूर्ति की तुलना मरे हुए व्यक्ति के तस्वीरों से करना निम्न सवालों को जन्म देता है....
1. क्या उस व्यक्ति के पूर्वजों की तरह ईश्वर भी मर चूका है कि इंसान उसको मूर्तियों में जिन्दा रखे?
2. यदि नहीं तो ईश्वर की मूर्तियाँ बनाने का पागलपन क्यों? यदि हाँ तो ईश्वर को समय और सीमा से मुक्त कहना मूर्खता नहीं तो क्या है?
3. यदि ईश्वर मर चूका है तो उसके कण-कण में व्याप्त होने की बात करना मूर्खता नहीं तो क्या है? फिर तो ईश्वर के न्यायी, कृपालु, दयावान, रक्षक होने की बात झूठी है। क्योंकि ये गुण कभी मुर्दों में नहीं हुआ करते।
स्वामी विवेकानन्द के उपरोक्त कथन से सिद्ध होता है कि वे हिन्दू विचारधारा के अनुसार ईश्वर के अविनाशी होने की बात को एक सिरे से ख़ारिज कर दिए है जबकि वे खुद को ईश्वर और धर्म के समर्थन में खड़ा करते हैं। बेहोशी सदैव बौद्धिक एवम् मानसिक विकास में बाधक है। यह बेहोशी और गहरी होती चली जाती है जब किसी स्वामी विवेकानन्द जैसे पब्लिक फेस से जुड़ी हो। यह स्वामी जी कि बेहोशी ही थी कि वे मार्गदर्शक और समाज सुधारक होते हुए भी जीवन को ग्रंथों(मान्यता, विश्वास इत्यादि) के माध्यम से देखना चाहे। यह स्वामी जी की बेहोशी ही थी कि लोगों को गड्ढे से निकालने के लिए उन्हें गढ्ढे को खोदने की सलाह दे बैठे। नतीज़तन लोग अपने साथ-साथ अपने परवार को भी गड्ढे में गिराते चले गए........      सूफ़ी ध्यान श्री।

2 comments:

  1. एक दिन स्वामी विवेकानंद को नास्तिकों की टुकड़ी ने घेर लिया था , बोल रहे थे भगवान् जैसी कोई चीज नहीं होती... तब स्वामी जी क्या मस्त उत्तर दिया पढियेगा..."भगवान् है या नहीं ये संदेह हो सकता है पर हम है कि नहीं ये सन्देह कभी नहीं होता , तो आप खुद अपने आप को ढुंढो की आप कौन हो !!??" तब नास्तिकों ने कहा कि ये दिख रहे है वही हम है... स्वामीजी ने कहा "ये तो गलत है , ये आपका हाथ है , ये आपके पैर , ये आपका सर आप कौन हो !!!?" ये सुनकर सब निरूत्तर हो गए...

    आप खुद को जानकर कहो की भगवान् नहीं है तो ठीक है , पर पहले खुद को तो जानो की "मैं" की सत्ता कहाँ से उठती है और कहाँ लीन होती है !!!?

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  2. पहली बात कि मैं नास्तिक नहीं। दूसरी बात कि संसार में ऐसा कोई प्रश्न नहीं जो किसी को निरुत्तर कर सके। रहा सवाल मैं की सत्ता के उठने का तो वह मनुष्य के मन का उसके वातावरण के सापेक्ष उसके पहचान को बताता है।

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