Saturday, April 22, 2017

सुप्रीम कोर्ट: आरक्षितों को सिर्फ कोटे में ही नौकरी

S Court: आरक्षितों को सिर्फ कोटे में ही नौकरी का फैसला  SC/ST/OBC के शोषण का नया अध्याय है, जो सामान्य वर्ग को आरक्षित करता है। इस फैसले ने 25% जनरल केटेगरी को 50 प्रतिशत आरक्षण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। एक तरह से इस फैसले ने obc/sc/st  से आरक्षण को छीनकर जनरल केटेगरी को दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निश्चय ही अन्यायपूर्ण है। यदि obc/sc/st को सिर्फ उनके कोटे में ही आरक्षित करना है तो फिर 77 %(obc-41%, sc/st-36%)  आरक्षित केटेगरी को आरक्षण मात्र 50% ही क्यों? यदि ऐसा ही करना है तो फिर 77% आरक्षित केटेगरी को 50% आरक्षण की बजाय 77% आरक्षण(obc-41%, sc/st-36%) मिलनी चाहिए। वरना आरक्षण की बात एक धोखा है, बेईमानी है उन सबके साथ जो वर्षों से पिछड़े व दबे-कुचले हैं। और आज भी उनके साथ वही हो रहा है...

Saturday, February 4, 2017

दम तोड़ता प्रजातंत्र (लघु कथा)

नशापुर में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो नशा का आदि न हो। शाम होते ही गाँव के गली एवं चैराहे शराब के नशे में इस कदर डूब जाते थे कि उन राहों में गुगल मैप भी लड़खड़ा जाये। ऊपर से आगामी विधानसभा का चुनाव मानो नशा पुर में शराब की नदियां उमड़ पड़ी हो। गाँव का बुरा हाल था। सड़क, बिजली, पानी, सफाई, विद्यालय इत्यादि बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण ग्रामवासी सामाजिक एवं आर्थिक रुप से अति पिछड़े थे। बुझन माझी उस गाँव का इकलौता शख्स जो नशे से कोसो दूर पढ़ा-लिखा, जिम्मेदार व जागरुक मतदाता था। रोजी-रोटी का एक मात्र साधन खेती-किसानी जिससे खाने भर अनाज पैदा हो जाता था। किन्तु इससे इकलौते बेटे की पढ़ाई का खर्च निकालना मुश्किल था। तथापि तमाम व्यक्तिगत एवं पारिवारिक समस्याओं के उपरान्त भी बुझन माझी गाँव की समस्याओं को लेकर चिन्तित रहता था। लोगों को समझाते- समझाते थक चुका था। मगर किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। शराब की लत गाँव के विकास के लिए बहुत बड़ी बाधक थी। शराब के लिए गाँव का एक-एक वोट बिक गया किन्तु बुझन माझी किसी भी प्रकार के राजनैतिक प्रलोभन में नहीं आने वाला था। वह वही किया जो उसे उचित लगा। आखिरकार वह दिन भी आया जब विधानसभा चुनाव सम्मपन्न होने के उपरान्त एक बार फिर नशा पुर को लम्बे-चैड़े वादे, आश्वाशन के सिवाय कुछ न मिला। चुनाव के बाद गाँव के विकास के इन्तजार में तीन साल बीत चुके थे । एक दिन बुझन माझी के बेटे की तबीयत बहुत बिगड़ गयी। आस-पास कोई डाक्टर न होने के कारण बुझन माझी उसे शहर ले गया। जहाँ डाक्टरों ने बताया की उसे ब्रेन ट्यूमर है। यह बात सुनकर मानो बुझन माझी के पैरों तले जमीन खिसक गयी हो। वह मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़ा। होश आने पर डाक्टरों ने बताया कि ब्रेन ट्यूमर के ऑपरेशन के लिए तीन लाख रुपये का इन्तजाम करो तो तुम्हारे बेटे की जान बचायी जा सकती है। बहुत कोशिशो के बाद भी बुझन माझी तीन लाख रुपये का इन्तजाम नही कर सका। गाँव वालों के समझाने पर बुझन माझी उस क्षेत्र के विधायक जी के चैखट का चक्कर मारता रहा किन्तु झुठे आश्वासन और वादे के सिवाय उसके हाथ कुछ न लगा। आखिरकार इलाज के अभाव में इकलौता बेटा दम तोड़ दिया। गाँव के अन्य लोगों की तरह बुझन माझी भी बेटे के गम में खुद को नशे में डूबो दिया। युहीं एक-एक दिन बीतते गये। एक बार फिर विधानसभा चुनाव नजदीक था। वहीं झुठे वादें, झूठी कसमें, दम तोड़ते आश्वासन और नशे में डूबा नशापुर अब तो ऐसा कोई शख्स नहीं था जो गाँव की बात करें, गाँव वालों की बात करें और गाँव की विकास की बात करें। बुझन माझी को भी विकास की जरुरत नहीं थी। उसे किसी चीज की जरुरत थी तो वह थी शराब की बोतल और वो उसे विधानसभा चुनाव के दौरान भरपुर मिल रही थी।                                                  .......सूफ़ी ध्यान श्री 

Monday, October 24, 2016

नास्तिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन

वृन्दावन में १४ अक्टूबर २०१६  को आयोजित होने  वाले नास्तिक सम्मलेन को असफ़ल बनाने के लिए  जो कुछ भी हुआ , वह निश्चय ही असंवैधानिक होने के साथ-साथ अमानवीय था. किन्तु अप्रत्याशित बिलकुल नहीं और न ही यह कोई नई बात हुई. सभ्यताओं के विकास और  सत्ता के चाह में धर्म का सहारा लेकर सदियों से कमजोरों, प्रगतिवादियों और आदिवासियों का शोषण होते आया है और आज भी  यह जारी है. उत्तर वैदिक काल में यदि कोई शुद्र वेद के मंत्र भी सुन ले तो उसके कानों में खौलता हुआ तेल डाल दिया जाता था और गुप्त काल में  तो नास्तिकों और बौद्धों का निर्मम कत्लेआम किया गया.  खैर छोड़िये इन सब बातों को क्योंकि गलत-सही घटनाओं से भरे होने के कारण मैं भूत/इतिहास को तवज्जु नहीं देता। परंतु वर्तमान जो आँखों के सामने हैं उससे इंकार नहीं किया जा सकता. एक बात तो तय है कि बुद्धिजीवी चाहे कितना ही पारदर्शी संविधान/कानून/नियम  बना ले। समाज/प्रशासन उसे अपने स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व अनुसार ढाल लेता है। स्वामी बालेंदु के विचारों व क्रियाकलापों का विरोध ऐसी ही व्यवस्था का परिणाम है।  जहाँ पब्लिक, पुलिस और प्रेस एक साथ है. क्या संविधान इस बात का अधिकार देता है कि एक बहुसंख्यक समुदाय अपनी आस्था और विश्वास को किसी अल्पसंख्यक समुदाय के ऊपर जबरदस्ती थोपे सके? वह भी इस तरह कि पब्लिक, पुलिस और प्रेस तीनों एक साथ होकर किसी के संवैधानिक अधिकारों का हनन करते रहे। यदि ऐसा है फिर वह दिन दूर नहीं जब संवैधानिक अधिकारों का हनन करते हुए सभी अल्पसंख्यकों से उनके अधिकार छीन लिए जाएंगे।
भारतीय संविधान की बात करें तो निम्न बातें स्पष्ट है -
१. भारतीय संविधान के भाग-३ अनुच्छेद-१४ सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समता और विधियों का समान  संरक्षण प्रदान करता है।  यहाँ 'व्यक्ति'  शब्द से तात्पर्य नागरिकों, अनागरिकों,  और विधिक व्यक्तियों से हैं।   भारतीय संविधान के भाग-३ अनुच्छेद-१५ राज्य धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग या जन्म  स्थान के आधार पर भेद नहीं कर सकता।  यहाँ 'राज्य' से तात्पर्य भारत की सरकार एवम संसद, राज्यों की सरकारें,  सभी स्थानीय प्राधिकारी और अन्य प्राधिकारी से है।  ऐसे में बालेंदु स्वामी के सम्मेलन पर इसलिए प्रतिबन्ध लगाया जाता है  जाता है कि वे नास्तिक है या फिर नास्तिकता का प्रचार कर रहे हैं तो निश्चय ही उनके साथ भेद हो रहा हैं। और भारतीय संविधान के उपरोक्त दोनों अधिकारों का हनन होता है। भारतीय संविधान के भाग-३ अनुच्छेद-१३ में उच्चतम न्यायालय को संवैधानिक अधिकारों का प्रहरी बनाया गया है।  ऐसे में क्या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सम्भव है जबकि उसका क्रियान्वयन इसी समाज द्वारा किया जा रहा है जहाँ किसी एक विचारधारा की बाहुल्यता है?
२. भारतीय संविधान के भाग-३ अनुच्छेद-१९(१) द्वारा  एक व्यक्ति को निम्न स्वतंत्रता दी गयी है -
A. वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
B. शांतिपूर्ण एवं निरायुध सम्मलेन की स्वतंत्रता
C. संगठन एवं संघ बनाने की स्वतंत्रता
ऐसे  में स्वामी बालेंदु को उपरोक्त तीनों कार्यों से रोका जाता है तो निश्चय ही उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है.
३. भारतीय संविधान के भाग-३ अनुच्छेद-२५(१) प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने का अधिकार देता है। ऐसे में स्वामी बालेंदु को उनकी आस्था और विश्वास से रोका जाता है तो निश्चय ही उनके उपरोक्त संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है।
४. भारतीय संविधान के भाग-३ अनुच्छेद- २९ भारत के प्रत्येक नागरिक को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसके बनाये रखने का अधिकार है।  उल्लेखनीय है कि यहाँ नागरिक से तात्पर्य सभी वर्गों से है। चाहे वे किसी विशेष धर्म से हो या न हो। ऐसे में स्वामी बालेंदु को उपरोक्त से रोक जाता है तो निश्चय ही उनके इस संवैधानिक अधिकार का   भी  हनन हो रहा है।
५.भारतीय संविधान के भाग-४ अनुच्छेद-५१(क)(८) अनुसार प्रत्येक नागरिक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करना चाहिए। ऐसे में यदि स्वामी बालेंदु को उक्त कार्यों से रोक जा रहा है तो निश्चय उनके मौलिक कर्तव्यों का गाला घोटा जा रहा है।  

यहाँ स्पष्ट है कि एक नास्तिक या स्वामी बालेंदु किसी आस्तिक के आस्था या विश्वास को रोकने नहीं जाते है और न ही उनके सम्मेलनों को रोकने  के लिए पब्लिक, पुलिस और प्रेस का सहारा लेते हैं. किन्तु यह सब स्वामी बालेंदु के साथ किया जा रहा है।  यहाँ स्पष्ट है कि स्वामी बालेंदु का विरोध/ उनके संवैधानिक  अधिकारों का हनन सिर्फ इसलिए किया जा रहा है कि वह एक नास्तिक है और उनकी संख्या कुछ गिनती में  हैं ।                                                                                   ...सूफ़ी ध्यान श्री              

Wednesday, July 20, 2016

सम्भालों अपनी गौ माताओं को

सूफ़ी ध्यान श्री की कलम से... गुजरात में दलित युवकों के साथ जो कुछ भी हुआ, निश्चय ही दुखद था। उससे भी बड़ा दुखद यह था कि दलितों द्वारा त्वरित प्रक्रिया में सार्वजनिक संपत्तियों को आग लगाना। मैं यहाँ यह बिल्कुल नहीं कहना चाहता कि दलितों को इस अन्याय और शोषण के विरुद्ध चुप रहना चाहिए था। किन्तु प्रतिक्रिया का स्वरुप कुछ और होना चाहिए था।एक ऐसा जवाब जो किसी सवाल का सटीक जवाब हो। जैसा कि अभी गुजरात में त्वरित प्रतिक्रिया से खुद को नियंत्रित करते हुए गुजराती दलित समाज द्वारा मृत गायों को सरकारी कार्यालयों तक इस सन्देश के साथ पहुँचाया जा रहा है कि तथाकथित गौ माताओं के बेटे अपने माताओं का अंतिम संस्कार स्वयं करे। मैं नहीं समझता कि इस अपंग, अपाहिज, अमानवीय, निर्दयी मनुवादी विचारधारा को इससे बेहतर जवाब दिया जा सकता है। इससे बड़ा पाप क्या हो सकता है कि गायों को माता कहने वाला यह समाज उन बेजुबान जानवरों के मरने के बाद उनकी चमड़ी उतारने के लिए दूसरों के हवाले कर देता है। क्या कोई बेटा अपनी माँ के मरने के बाद उसकी चमड़ी उतारने के लिए उसे किसी और को सौंप सकता है। इस बर्बरता पूर्वक निर्णय को सोचने मात्र से रूँह काप उठता है। आखिर अपनी माताओं का संस्कार तथा कथित बेटे क्यों नहीं करते? यही सही समय है कि गुजरात ही नहीं बल्कि पुरे भारतीय दलित समाज को इस सफाई कार्य से खुद को अलग करते हुए इन मृत माताओं को तथाकथित उनके बेटों के हवाले कर देना चाहिए। ताकि वे अपनी माताओं का अंतिम संस्कार धूम-धाम से कर सके। क्यों न यह सारी जिम्मेदारी मनुवादी दृष्टिकोण के ठेकेदारों के माथे सौप देना चाहिए जो आये दलितों एवम् कमजोरों का शोषण धर्म और परम्परा के नाम पर करते आ रहे हैं?         

Monday, November 9, 2015

बुद्ध या बुद्धू

यक़ीनन महात्मा बुद्ध जैसा व्यक्तित्व विश्व इतिहास में गिने चुने हुए । किन्तु उनका होना वैसे ही है जैसे अँधों में कोई काना राजा हो। ज्ञान प्राप्त करने और सत्य को जानने की सनक एवं पागलपन कहीं और, किसी अन्य में देखने की बात वैसे ही है जैसे सूरज को दीपक दिखाने की। किन्तु नतीजे और परिणाम की बात हो तो वैसे ही है जैसे खोदा पहाड़ निकली चुहिया। घर-परिवार और समाज को छोड़कर ६ सालों के अथक प्रयास एवं ज़मीन-जंगल-जल की ख़ाक छानने के बाद आख़िरकार उन्हें मिला क्या? चार आर्य सत्य-संसार में दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निवारण और  दुःख निवारण के उपाय जिनमें से  एक ( दुःख का ) को छोड़ दिया जाय तो अन्य तीन पूर्णतः झूठ है। बुद्ध के जीवन पर्यन्त अथक प्रयास एवं उनकी उपल्बधियाँ वैसे ही हैं जैसे किसी बुद्धू का तूफ़ान में रेत का महल तैयार करने की बात। एक सत्य को जानने के लिए घर-परिवार का परित्याग करके एक सत्य के साथ तीन झूठ को सत्य मान लेना कहीं से भी बुद्धिमता की निशानी प्रतीत नहीं होती। जिस सत्य की तलाश में उन्हें अपना घर-परिवार छोड़ना पर उस सत्य को उनके साथ भी रहकर जाना जा सकता था। इतना ही इतना ही नहीं , इस तरह से जाना हुआ सच हरेक तरह से इन तीनों झूठ से मुक्त होता। जहाँ तक मेरे अभ्यास, अनुभवों और अनुभूतियों की बात है तो मैं देख रहा हूँ। … 

 - संसार में दूर-दूर तक कहीं भी दुःख नहीं दिख रहा। मैं देख रहा हूँ कि जो घटना या कारण किसी के लिए दुःख का कारण है तो वही किसी अन्य के लिए सुख का कारण जैसे- वर्षात किसानों के लिए लाभदायक है तो कुम्हारों के लिए नुक्सानदायक। दरअसल इस संसार में सुख-दुःख जैसी कोई चीज है ही नहीं । यदि दुःख सचमुच है तो एक दुःख हरेक के  लिए दुःख होता और एक सुख हरेक के लिए सुख होता। किन्तु हकीकत के धरातल पर ऐसा कतई नहीं होता। दरअसल सुख या या दुःख बाह्य वातावरण के प्रति मन की प्रतिक्रिया मात्र है, यह हमारी मानसिक अवस्था मात्र है। 

-  एक 'दुःख का कारण' ही है जिससे दुःख, दुःख का निवारण और दुःख निवारण के उपाय दीखता है। निश्चय ही दुःख की कारण हमारी  तृष्णाएं (जैसा की बुद्ध ने कहा ) हैं जिनके हमारे अनुरूप न होने से हमें दुःख होता है ।

- जब संसार में दुःख है ही नहीं तो उसके निवारण सम्भव ही नहीं है।

- जब दुःख एवं उसका निवारण है ही नहीं तो दुःख निवारण के मार्ग की बात करना एक बेईमानी और छल के सिवाय कुछ नहीं।

महात्मा बुद्ध का यही भ्रम और बुद्धूपन उन्हें कभी सामाजिक-धार्मिक दुर्व्यवस्थाओं  तो कभी अपने अनुआयियों के आपसी कलह में फँसाएं रखा। जबकि समस्या तो उनका मन (तृष्णा ) था।  वे व्यक्ति, परिवार, समाज से तो भाग गए किन्तु खुद से भागकर कहाँ जाते। वे जहाँ गए वहॉँ एक नए व्यक्ति, परिवार और समाज का सामना करना पड़ा । आख़िरकार जीवन यापन के लिए व्यक्ति, परिवार और समाज को किसी न किसी  रूप में स्वीकार तो करना ही पड़ेगा। भले ही वह अपने ही शर्तों पर क्यों न हो? समस्या तब भी बाह्य नहीं होगी। समस्या तो अब भी आंतरिक है और हमेशा रहेगी क्योंकि हम दुनिया से तो भाग सकते हैं किन्तु खुद से भागकर कहाँ जाएँ ?

Monday, October 19, 2015

स्वामी विवेकानंद की बेहोशी

यक़ीनन बेहोशी अंधविश्वास, मान्यता, पागलपन जैसी इत्यादि बुराइयों की कारक  है। यह बेहोशी और भी खतरनक हो जाती है जब यह स्वामी विवेकानंद जैसे किसी पब्लिक फेस से जुड़ी हो। ऐसे में समर्थक बाह्य और अन्तः निकाय को सत्य के सापेक्ष न देखकर व्यक्ति विशेष या फिर मान्यता विशेष के सापेक्ष देखने लगते हैं और इस तरह बेहोशी और भी गहरी होती चली जाती है। कारण यह है कि लोगों का विश्वास एवं मान्यता कभी भी  एक सामान नहीं हो सकती है। ऐसे में लोग सत्य का साक्षी होने के बजाय अपनी मान्यता अनुसार किसी सत्य को झूठ मानते चले जाते हैं। ऐसा ही कुछ स्वामी विवेकानंद और उनके समर्थकों के साथ है।
यदि स्वामी विवेकानंद के अध्यात्म के क्षेत्र में किये गए कार्यों का विश्लेषण किया जाय तो हम पाएंगे कि किसी ने पुरानी शराब को नयी पैकिंग के साथ लोगों के बीच रख दिया हो जिसे पीकर लोगों का बेहोश होना अप्रत्याशित नहीं  है। कुछ दिन पूर्व एक न्यूज़ पेपर के सम्पादकीय पृष्ठ पर किसी ने शिकागों में संपन्न प्रथम विश्व सर्व धर्म सम्मलेन में स्वामी जी के सम्बोधन के उपरान्त किसी गृहस्थ के घर पर उसके द्वारा उठाये गए मूर्ति पूजा पर सवाल और उस पर स्वामी जी के हाज़िर जवाबी का उल्लेख ऐसे था जैसे किसी भिखमंगे को एक रूपये के सिक्के की जगह १००० रूपये का नोट मिल गया और वह उस व्यक्ति को सबसे बड़ा दानवीर मान बैठा हो दरअसल दोष न देने वाले का है  और न ही लेने वाले का। बल्कि दोष तो उस भिखमंगे की आदत का जिसके कारण वह खुद को अपाहिज, अपंग और दूसरों पर निर्भर होता चला जाता है। स्वामी जी के इसी वृतांत का जिक्र अभी कुछ रोज पहले अपने एक फेसबूकियें मित्र के एक पोस्ट पर किसी के कॉमेंट के रूप में देखा। अब इन भिखारियों को कोई कैसे समझाए कि इस संसार में ऐसे-ऐसे दानवीर पड़े हुए हैं जो अपने जीवन भर की कमाई को एक पल में लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं । किन्तु इस सत्य का साक्षी होने के लिए एक भिखारी के लिए जरुरी है कि वह अपनी माँगने की आदत से, अपनी मान्यता से, अपनी नीचता से बाज आते हुए सत्य को उस रूप में स्वीकार करें जैसा कि वह है
बहरहाल स्वामी विवेकानंद की उस हाज़िर जवाबी का बात करते हैं। किसी व्यक्ति द्वारा मूर्तिपूजा पर उठाये गए सवाल और उसके घर की दीवारों से लगी उसके पूर्वजों की तस्वीरों पर स्वामी जी ने पूछा कि अपने घर की दीवारों पर किनकी तस्वीरें लगा रखे हो और क्यों ? उस व्यक्ति ने कहा कि ये तस्वीरें उसके पूर्वजों की है और दीवारों पर इस लिए लगा रखा है क्योंकि अब वे इस दुनिया में नहीं है। अब ये तस्वीरें ही एक मात्र साधन है जिससे आने वाली पीढ़ियाँ अपने पूर्वजों के बारे में जान सकती है। उस पर स्वामी विवेकानन्द ने कहा जिस तरह से आप अपने पूर्वजों के इस दुनिया से गुजर जाने के बाद उन्हें  तस्वीरों और अपने मान्यताओं में मानते हैं। ठीक उसी प्रकार हम ईश्वर को मूर्ति रूप में मानते हैं। स्वामी जी के इस जवाब पर वह व्यक्ति निरुत्तर हो गया। उस व्यक्ति की मन की सीमा उतनी ही थी जिससे वह न आगे निकल पाया और न ही उसे तोड़ पाया। किन्तु स्वामी विवेकानन्द का यह कहना उनकी बेहोशी और बचपना नहीं तो क्या है क्योंकि उस व्यक्ति ने स्वामी जी को स्पष्ट बताया था कि अपने पूर्वजों के गुजरने के बाद उनकी तस्वीरों को उनकी जगह पर स्वीकारते हैं। स्वामी विवेकानन्द का ईश्वर की मूर्ति की तुलना मरे हुए व्यक्ति के तस्वीरों से करना निम्न सवालों को जन्म देता है....
1. क्या उस व्यक्ति के पूर्वजों की तरह ईश्वर भी मर चूका है कि इंसान उसको मूर्तियों में जिन्दा रखे?
2. यदि नहीं तो ईश्वर की मूर्तियाँ बनाने का पागलपन क्यों? यदि हाँ तो ईश्वर को समय और सीमा से मुक्त कहना मूर्खता नहीं तो क्या है?
3. यदि ईश्वर मर चूका है तो उसके कण-कण में व्याप्त होने की बात करना मूर्खता नहीं तो क्या है? फिर तो ईश्वर के न्यायी, कृपालु, दयावान, रक्षक होने की बात झूठी है। क्योंकि ये गुण कभी मुर्दों में नहीं हुआ करते।
स्वामी विवेकानन्द के उपरोक्त कथन से सिद्ध होता है कि वे हिन्दू विचारधारा के अनुसार ईश्वर के अविनाशी होने की बात को एक सिरे से ख़ारिज कर दिए है जबकि वे खुद को ईश्वर और धर्म के समर्थन में खड़ा करते हैं। बेहोशी सदैव बौद्धिक एवम् मानसिक विकास में बाधक है। यह बेहोशी और गहरी होती चली जाती है जब किसी स्वामी विवेकानन्द जैसे पब्लिक फेस से जुड़ी हो। यह स्वामी जी कि बेहोशी ही थी कि वे मार्गदर्शक और समाज सुधारक होते हुए भी जीवन को ग्रंथों(मान्यता, विश्वास इत्यादि) के माध्यम से देखना चाहे। यह स्वामी जी की बेहोशी ही थी कि लोगों को गड्ढे से निकालने के लिए उन्हें गढ्ढे को खोदने की सलाह दे बैठे। नतीज़तन लोग अपने साथ-साथ अपने परवार को भी गड्ढे में गिराते चले गए........      सूफ़ी ध्यान श्री।