Monday, October 19, 2015

स्वामी विवेकानंद की बेहोशी

यक़ीनन बेहोशी अंधविश्वास, मान्यता, पागलपन जैसी इत्यादि बुराइयों की कारक  है। यह बेहोशी और भी खतरनक हो जाती है जब यह स्वामी विवेकानंद जैसे किसी पब्लिक फेस से जुड़ी हो। ऐसे में समर्थक बाह्य और अन्तः निकाय को सत्य के सापेक्ष न देखकर व्यक्ति विशेष या फिर मान्यता विशेष के सापेक्ष देखने लगते हैं और इस तरह बेहोशी और भी गहरी होती चली जाती है। कारण यह है कि लोगों का विश्वास एवं मान्यता कभी भी  एक सामान नहीं हो सकती है। ऐसे में लोग सत्य का साक्षी होने के बजाय अपनी मान्यता अनुसार किसी सत्य को झूठ मानते चले जाते हैं। ऐसा ही कुछ स्वामी विवेकानंद और उनके समर्थकों के साथ है।
यदि स्वामी विवेकानंद के अध्यात्म के क्षेत्र में किये गए कार्यों का विश्लेषण किया जाय तो हम पाएंगे कि किसी ने पुरानी शराब को नयी पैकिंग के साथ लोगों के बीच रख दिया हो जिसे पीकर लोगों का बेहोश होना अप्रत्याशित नहीं  है। कुछ दिन पूर्व एक न्यूज़ पेपर के सम्पादकीय पृष्ठ पर किसी ने शिकागों में संपन्न प्रथम विश्व सर्व धर्म सम्मलेन में स्वामी जी के सम्बोधन के उपरान्त किसी गृहस्थ के घर पर उसके द्वारा उठाये गए मूर्ति पूजा पर सवाल और उस पर स्वामी जी के हाज़िर जवाबी का उल्लेख ऐसे था जैसे किसी भिखमंगे को एक रूपये के सिक्के की जगह १००० रूपये का नोट मिल गया और वह उस व्यक्ति को सबसे बड़ा दानवीर मान बैठा हो दरअसल दोष न देने वाले का है  और न ही लेने वाले का। बल्कि दोष तो उस भिखमंगे की आदत का जिसके कारण वह खुद को अपाहिज, अपंग और दूसरों पर निर्भर होता चला जाता है। स्वामी जी के इसी वृतांत का जिक्र अभी कुछ रोज पहले अपने एक फेसबूकियें मित्र के एक पोस्ट पर किसी के कॉमेंट के रूप में देखा। अब इन भिखारियों को कोई कैसे समझाए कि इस संसार में ऐसे-ऐसे दानवीर पड़े हुए हैं जो अपने जीवन भर की कमाई को एक पल में लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं । किन्तु इस सत्य का साक्षी होने के लिए एक भिखारी के लिए जरुरी है कि वह अपनी माँगने की आदत से, अपनी मान्यता से, अपनी नीचता से बाज आते हुए सत्य को उस रूप में स्वीकार करें जैसा कि वह है
बहरहाल स्वामी विवेकानंद की उस हाज़िर जवाबी का बात करते हैं। किसी व्यक्ति द्वारा मूर्तिपूजा पर उठाये गए सवाल और उसके घर की दीवारों से लगी उसके पूर्वजों की तस्वीरों पर स्वामी जी ने पूछा कि अपने घर की दीवारों पर किनकी तस्वीरें लगा रखे हो और क्यों ? उस व्यक्ति ने कहा कि ये तस्वीरें उसके पूर्वजों की है और दीवारों पर इस लिए लगा रखा है क्योंकि अब वे इस दुनिया में नहीं है। अब ये तस्वीरें ही एक मात्र साधन है जिससे आने वाली पीढ़ियाँ अपने पूर्वजों के बारे में जान सकती है। उस पर स्वामी विवेकानन्द ने कहा जिस तरह से आप अपने पूर्वजों के इस दुनिया से गुजर जाने के बाद उन्हें  तस्वीरों और अपने मान्यताओं में मानते हैं। ठीक उसी प्रकार हम ईश्वर को मूर्ति रूप में मानते हैं। स्वामी जी के इस जवाब पर वह व्यक्ति निरुत्तर हो गया। उस व्यक्ति की मन की सीमा उतनी ही थी जिससे वह न आगे निकल पाया और न ही उसे तोड़ पाया। किन्तु स्वामी विवेकानन्द का यह कहना उनकी बेहोशी और बचपना नहीं तो क्या है क्योंकि उस व्यक्ति ने स्वामी जी को स्पष्ट बताया था कि अपने पूर्वजों के गुजरने के बाद उनकी तस्वीरों को उनकी जगह पर स्वीकारते हैं। स्वामी विवेकानन्द का ईश्वर की मूर्ति की तुलना मरे हुए व्यक्ति के तस्वीरों से करना निम्न सवालों को जन्म देता है....
1. क्या उस व्यक्ति के पूर्वजों की तरह ईश्वर भी मर चूका है कि इंसान उसको मूर्तियों में जिन्दा रखे?
2. यदि नहीं तो ईश्वर की मूर्तियाँ बनाने का पागलपन क्यों? यदि हाँ तो ईश्वर को समय और सीमा से मुक्त कहना मूर्खता नहीं तो क्या है?
3. यदि ईश्वर मर चूका है तो उसके कण-कण में व्याप्त होने की बात करना मूर्खता नहीं तो क्या है? फिर तो ईश्वर के न्यायी, कृपालु, दयावान, रक्षक होने की बात झूठी है। क्योंकि ये गुण कभी मुर्दों में नहीं हुआ करते।
स्वामी विवेकानन्द के उपरोक्त कथन से सिद्ध होता है कि वे हिन्दू विचारधारा के अनुसार ईश्वर के अविनाशी होने की बात को एक सिरे से ख़ारिज कर दिए है जबकि वे खुद को ईश्वर और धर्म के समर्थन में खड़ा करते हैं। बेहोशी सदैव बौद्धिक एवम् मानसिक विकास में बाधक है। यह बेहोशी और गहरी होती चली जाती है जब किसी स्वामी विवेकानन्द जैसे पब्लिक फेस से जुड़ी हो। यह स्वामी जी कि बेहोशी ही थी कि वे मार्गदर्शक और समाज सुधारक होते हुए भी जीवन को ग्रंथों(मान्यता, विश्वास इत्यादि) के माध्यम से देखना चाहे। यह स्वामी जी की बेहोशी ही थी कि लोगों को गड्ढे से निकालने के लिए उन्हें गढ्ढे को खोदने की सलाह दे बैठे। नतीज़तन लोग अपने साथ-साथ अपने परवार को भी गड्ढे में गिराते चले गए........      सूफ़ी ध्यान श्री।

Sunday, September 6, 2015

क्या मैं एक नाम के सिवाय कुछ भी नहीं ?

अपना नाम अनिल कुमार गुप्ता से अनिल कुमार 'अलीन' करने पर उतना हंगामा नहीं हुआ जितना कि अनिल कुमार 'अलीन' से सूफी ध्यान श्री करने पर हुआ।  पब्लिकली तो बस इतना ही हुआ कि एक प्यासी धरती पर बारिश की दो-चार बुँदे गिरते ही बूंदें वाष्प हो गयी।  परन्तु मेरे व्यक्तिगत मेल, व्हाट्सएप्प, मेसेंजर इत्यादि पर इतनी बारिश हुई कि बाढ़ के पानी से वर्षों से मेरे मन-मस्तिक में जमी धूल बह गयी।  खुद के होने  और न होने  का सारा भ्रम टूट गया।  यह राज अब जाकर खुला कि  मैं सिवाय एक नाम के कुछ नहीं था जिससे  मेरा समाज मुझे जानता था।  मेरी अपनी कोई पहचान नहीं, एक उधार की पहचान जो निश्चित रूप से मुझ जैसे व्यक्ति से एक दिन  छीन जानी थी सो छीन गयी।  कारण स्पष्ट है कि मुझ जैसे लोगों के पास ऐसा कुछ नहीं सिवाय उनके झूठ के उन्हें देने को।  अतः लेन-देन का यह व्यापार ज्यादा दिन तक खींचना मुमकिन नहीं था।  यह मेरे बस की बात नहीं कि किसी को खुश रखने के लिए वह बोलू जो वह हैं ही नहीं।  अच्छा हुआ कि उनका झूठ उन तक पहुँच गया।  विभिन्न प्रकार के लोगों से हुई चर्चा के अनुभव आप तक इस उम्मीद के साथ लाया हूँ कि यदि आपका भी इसमें कुछ हिस्सा हो तो सहर्ष अपना हिस्सा ले जाये। 
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आस्तिक       :-  भाई! तुम्हारा तो नाम अनिल कुमार 'अलीन' था। 
सूफ़ी ध्यान श्री:- जी बिल्कुल।  

आस्तिक        :-  मैं किस नाम को स्वीकार करू?
सूफ़ी ध्यान श्री:-  क्यों भाई? क्या मेरा कोई अपना अस्तित्व नहीं?

आस्तिक       :-   यह कैसा सवाल है?
सूफ़ी ध्यान श्री:-   माफ़ करियेगा.। यह कोई सवाल नहीं बल्कि आपके सवाल का जवाब, सवाल के रूप में है। 

आस्तिक        :-   लगता है आपने मेरा सवाल नहीं समझा?
सूफ़ी ध्यान श्री:-   फिर आप ही समझाएं। 
आस्तिक       :-   आप पल-पल अपने नाम को बदलते रहते हो। हम कैसे और आपके किस नाम पर यकीन करें?
सूफ़ी ध्यान श्री:-   जी, क्या आप बताना चाहेंगे कि आपने पहली बार किस पर यकीन किया था? मतलब मुझ पर या मेरे नाम पर। 
आस्तिक       :-  जी आप पर।   
सूफ़ी ध्यान श्री:- अब मैं खुद को सूफी ध्यान श्री कहता हूँ।  फिर तो आपको मुझ पर यकीन करना होगा।

आस्तिक       :- मेरे कहने का मतलब कि  अब तो मुझे आपके नाम अनिल कुमार गुप्ता पर यकीन हो गया था।  फिर अब आप पर कैसे यकीन करूँ कि आपका नाम  सूफ़ी ध्यान श्री है।   
सूफ़ी ध्यान श्री:- भाई, फिर तो किसी बात का टेंशन ही नहीं क्योंकि आपको मुझ पर यकीन नहीं, मेरे नाम पर है।  फिर तो आपको मुझसे पूछना कहीं से भी जायज़ नहीं लगता क्योंकि आपको मुझ पर यकीं न होकर मेरे नाम 'अनिल कुमार गुप्ता' पर है।  यह सवाल आपको अनिल कुमार गुप्ता से पूछना चाहिए क्योंकि मैं तो सूफ़ी ध्यान श्री हूँ। 

आस्तिक       :-  मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा।  बिल्कुल कन्फ्यूज्ड हो भाई।  
सूफ़ी ध्यान श्री:-   भाई! कमाल है।  समझ में तुम्हें नहीं आ रहा है और कन्फ्यूज्ड मुझे बता रहे हो। 

आस्तिक        :-   मुझे माफ़ करो भाई। 
सूफ़ी ध्यान श्री:-    भाई! गलती आपसे हुई है।  भला मैं कैसे माफ़ कर दूँ।  समस्या आपकी है तो समाधान भी आप ही के पास होगा।  
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नास्तिक        :- भाई! आपने यह आस्तिकों वाला नाम क्यों रख लिया?
सूफ़ी ध्यान श्री:- क्यों,का क्या मतलब है? बस अच्छा लगा रख लिया।

नास्तिक       :- किन्तु ऐसे नाम प्रत्यक्ष रूप से आस्तिकता का समर्थन करते हैं। 
सूफ़ी ध्यान श्री:-  आस्तिक तो अपनी आस्तिकता को इस संसार के कण-कण से जोड़ते हैं। फिर क्या आप इस संसार की वस्तुओं का उपभोग करना छोड़ दिए या फिर इस संसार को छोड़ दिए ?

नास्तिक        :- नहीं भाई। किन्तु जो छोड़ने योग्य है।  उसे छोड़ ही सकते हैं 
सूफ़ी ध्यान श्री:-  फिर क्या आप बताना चाहेंगे कि नास्तिकता का वह कौन सा पैमाना है?  जिससे नास्तिकता की माप की जाय. जिससे एक नास्तिक को पता चलता रहे कि कहीं वह आस्तिक तो नहीं होते जा रहा.

नास्तिक      :-  नहीं भाई।  नास्तिकता तो इतनी ही है कि ईश्वर के अस्तित्व के होने से इंकार करना।  जिसमे किसी पैमाने की जरुरत नहीं। 
सूफ़ी ध्यान श्री:- तो आपको क्या लगता है ? मेरा नाम या फिर मैं या दोनों ईश्वर है। 

नास्तिक       :- जी।  मतलब  उस जैसा तो है। 
सूफ़ी ध्यान श्री:- मतलब आपको पता है कि  ईश्वर कैसा  है। तभी तो आप मेरी उससे तुलना कर रहे हो। कहीं आप आस्तिक तो नहीं। 

नास्तिक          :- जी,बिल्कुल  नहीं। आप शब्दों के जादूगर हो।  शब्दों से चमत्कार उत्पन्न कर रहे हो। 
सूफ़ी ध्यान श्री:- आपकी बाते तो बिल्कुल  आस्तिकों की तरह है  जो अपने कल्पित ईश्वर या ख़ुदा को चमत्कारी कहता है। 

नास्तिक        :- भाई।  मैं चलता हूँ।  मुझे माफ़ करना।
सूफ़ी ध्यान श्री:-  फिर वही बात ....... … 
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वकील            :- ज़नाब! आपका नाम संभवतः अनिल कुमार  गुप्ता है। 
सूफ़ी ध्यान श्री:-  जी था।  अब नहीं है। 

वकील            :-  तो क्या आपने अपना नाम कागजों से भी बदल लिया। 
सूफ़ी ध्यान श्री:-   जी, बिल्कुल नहीं।  मैं कागजों पर चढ़ाया ही नहीं तो फिर मैं बदलू क्यों?

वकील           :-  भाई, आप पर यकीन  कोई करे तो कैसे करें।  प्रमाणिकता तो कागजों की ही होती है। 
सूफ़ी ध्यान श्री:-  यदि प्रमाणिकता कागजों की होती है तो भाई जाकर उन कागजों से पूछो।  खामोखां अपना और मेरा वक्त  जाया क्यों कर रहे हो?

वकील           :-  यार दिमाग़ के पैदल लगते हो।  तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। 
सूफ़ी ध्यान श्री:-  शुक्रिया।  क्या यह कम है कि आपका हो जाये?………



Thursday, September 3, 2015

ज्ञान मुद्रा

साथियों मानव जीवन के लिए उपयोगी कुछ मुद्राओं और उससे होने वाले लाभ को इस उम्मीद के साथ आपके सम्मुख रख रहा हूँ ताकि आप भी इससे कहीं न कहीं लाभान्वित हो सके।  मुद्राओं को जानने के लिए हाथ की उँगलियों की स्थिति का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है. जैसा की संलग्न चित्र में हाथ की उँगलियों और अंगूँठा की स्थिति बायें से दायें (Clock Wise ) चलने पर निम्नवत देख सकते हैं …

१. अंगूँठा 

२. तर्जनी 

३. मध्यमा 

४. अनामिका 

५. कनिष्का 

ज्ञान मुद्रा:-

आरम्भ करते हैं  … ज्ञान मुद्रा की विधि और उससे होने वाले लाभ से। 

संलग्न चित्र में, जैसा कि आप मुझे पदमासन की स्थिति में  बैठे देख सकते हैं।  जिसके लिए  जरुरी है कि आप अपने दायें पैर को बाएं जांघ पर और बाएं पैर को दायें जाँघ पर रखते हुए आसन इस प्रकार  ग्रहण करें कि आपके नितम्ब के साथ-साथ दोनों पैर जमीन से भलीभाँति चिपके हुए हो।  साथ ही रीढ़ की हड्डी के सहारे सीधा बैठे।  ज्ञान मुद्रा धारण करने के लिए अपने हाथों के अंगूँठा के अगले भाग को तर्जनी ऊँगली के अगले भाग से स्पर्श करते हुए संग्लन चित्र की भाँति अन्य तीनों उँगलियों को सीधा रखते हुए आँख बंद करके साँस यथाथवत लेते रहे।आप बस इस बात का ध्यान रखे कि किसी भी मुद्रा को करते समय आप तनाव रहित हो। 

लाभ:-

इस मुद्रा का अभ्यास प्रतिदिन २५-३० करने से मानसिक रोग जैसे कि अनिद्रा अथवा अति निद्रा, कमजोर यादाश्त, क्रोधी स्वभाव इत्यादि में अत्यंत लाभ मिलने के साथ ही आपकी स्मरण शक्ति बढ़ती है. यह मुद्रा छात्रों और तनाव ग्रस्त लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है. आज के लिए इतना ही …। अगली बार किसी अन्य मुद्रा और उसके अभ्यास से होने वाले लाभ के साथ प्रस्तुत होऊंगा। तबतक के लिए आप सभी का धन्यवाद।         …… सूफ़ी ध्यान श्री 

Sunday, August 30, 2015

आरक्षण …एक सामाजिक अवरोध

अभी दस दिन पहिले मेरे दूर के हम उम्र चाचा जी ने आरक्षण पर कुछ लिखने को मुझे निर्देशित किया। मैं क्या कुछ लिखूँ सिवाय अपने अनुभवों के? उधर गुजरात में पटेलों द्वारा खुद के आरक्षण मांग को लेकर इलेक्टानिक, प्रिंट मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया  का माहौल आये दिन गरमाए रहता है। 
 किन्तु इस समस्या, समस्या  के कारण एवं समस्या के समाधान को  जानने और  समझने के लिए यहाँ हमें खुद को तटस्थ रखकर वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था की स्थिति का अवलोकन करना होगा. .... 

समस्या:-

                  सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए भारतीय संविधान द्वारा बनायी गयी वर्तमान विशेष वर्ग एवं जातिगत आरक्षण व्यवस्था ही समस्या है। वैसे भी यदि अपाहिज और अपंग रहने से, बिना मेहनत के भोजन-पानी मिलने लगे फिर तो हट्टा-कट्टा स्वस्थ व्यक्ति भी खुद को अपाहिज कहने लगता हैं। बस समस्या यही हैं। इसे विस्तार से समझने के लिए 'समस्या के कारण' शीर्षक अंतर्गत अपना अनुभव और अन्वेषण रखता हुँ. 

समस्या के कारण :-

भले ही इस समस्या का कारण वर्तमान आरक्षण व्यवस्था प्रतीत हो रहा हो। किन्तु इसकी जड़ लगभग ३५०० साल पहिले स्थापित मनु स्मृति वर्ण व्यवस्था से पोषण पा रही है और तब तक पाती रहेगी जबतक कि एक ब्राह्मण का लड़का ब्राह्मण, एक क्षत्रिय का लड़का क्षत्रिय ……इत्यादि जन्मजात एवं जातिगत होता रहेगा। यह अपाहिज और अपंग सामाजिक दुर्व्यवस्थता है जो पुरे भारतीय समाज को संवेदन शून्य करते हुए सामाजिक असमानता की खाई चौड़ी करती जा रही है जो समय के साथ कहीं से भी भरती हुई नहीं प्रतीत होती सिवाय कुछ अपवादों के। इसका परिणाम है लोगों के बीच बढ़ता हुआ असंतोष जो नक्सलवाद जैसी विकराल समस्या की जननी भी है। इस मनुवादी व्यवस्था ने जहाँ स्वर्ण जातियों को सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक, शैक्षिक, मानसिक, आध्यात्मिक और वैश्विक रूप से मजबूत बनाया, वही दूसरी तरफ शूद्र एवं पिछड़ी जातियों को कमजोर एवं अपंग।इन्हें स्कूलों, मंदिरों एवं सामाजिक संस्थानों के साथ-साथ  समाज से बहिस्कृत रखा गया। यदि कोई कमजोर अपने मेहनत  और शिक्षा के बल पर किसी सम्मानित नौकरी के लिए क्वालीफाई भी कर ले तो साक्षात्कार पैनल में बैठे स्वर्ण जातियों के उनके प्रति उदासीनता के कारण फिर उसे अपनी आरम्भिक अवस्था में जाना पड़ता था। भारत की १९४७ की स्वतंत्रता के बाद इस अमानवीय व्यवस्था को संतुलित करने के लिए भारतीय संविधान में अपनी पूर्व की पीढ़ियों द्वारा की गयी गलती से सबक न लेते हुए एक बार पुनः आरक्षण के नाम पर जाति व्यवस्था को लागु किया गया। नतीजतन एक नयी प्रकार की समस्या ने जन्म लिया है और वह यह कि जो अनारक्षित वर्ग में पिछड़े और कमजोर हैं। वे और पिछड़ते जा  हैं। यह अलग बात है कि इनकी संख्या अब भी आरक्षित वर्ग से बहुत कम हैं। परन्तु भविष्य में अपने अस्तित्व के संकट को लेकर इनकी चिंता ने खुद के आरक्षण को लेकर सोचने को मजबूर कर दिया। सरकार में आने वाली पार्टियों के पास अपना वोट बैलेंस बनाने के अलावा कोई दूसरा ऐसा उचित पैमाना या मानक नज़र नहीं आता जिससे वे सही जरुरत मंदों को निर्धारित कर सके। जिस परिवार के पास १०० हेक्टयर जमीं और लाखों की संपत्ति है वो भी अपनी संपत्ति का कोई मोल न दिखाकर खुद को गरीब, कमजोर और पिछड़ा बताता है। भले ही घर अनाजों से भरे हो किन्तु पैदावार को शुन्य या फिर कम दर्शाता है ताकि सरकार के तमाम अनुदानों के फायदा उठाने के साथ-साथ 'कर' की चोरी कर सके।

समस्या का समाधान :-

इस समस्या का समाधान जातिगत व्यवस्था के रहते हुए खत्म होते प्रतीत नहीं होती क्योंकि पूरी समस्या की जनक यह जातिगत व्यवस्था और मानसिकता है। जिसको ख़त्म करने के लिए कठोर कानून बनाने के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता को फैलाने के लिए व्यापक स्तर पर नवजागरण की शुरुवात करनी होगी। जिसके लिए सरकार और समाज से व्यवस्था परिवर्तन के लिए निम्न कदमों का क्रियान्वयन अपेक्षित है....... 
१. जातिगत व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए यह कानून बना दिया जाय कि एक परिवार में कम से कम २-३ अंतर्जातीय विवाह करना अनिवार्य है।  
२. सभी जातियों के लिए कोई एक उचित मानक (जो जातिगत न हो) बनाकर पिछड़े और कमजोर लोगों का आकलन किया जाय तथा उनके अनुपात में उन्हें आरक्षण दिया जाय।
३. एक परिवार के किसी एक ही व्यक्ति को नौकरी में आरक्षण दिया जाय। यदि कोई नौकरी में आरक्षण प्राप्त व्यक्ति अपने पुरे परिवार की जिम्मेदारी न उठाकर, परिवार के कुछ सदस्यों को खुद से अलग कर देता है तो इससे आरक्षण को छीनकर उस परिवार के अन्य किसी व्यक्ति को, जो योग्य है और जिम्मेदारी उठाने को तैयार हो, दे दिया जाय। वरना आरक्षण के लालच में एक व्यक्ति अपने पुरे परिवार को विघिटित कर एक से अधिक परिवार बना सकता है ताकि परिवार के सभी सदयों को आरक्षण मिल सके। 
४. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण प्राप्त व्यक्तियों नौकरियों में आरक्षण बंद किया जाय। साथ ही साथ नौकरियों में आरक्षण प्राप्त व्यक्तियों को पदोन्नति में आरक्षण को ख़त्म किया जाय।. 
५. एक पीढ़ी को आरक्षण मिलने के उपरान्त दूसरी पीढ़ी को आरक्षण से महरूम रखा जाय। 
६. जिनके घर में नौकरी और वंशागत जमीन या फिर वंशागत संपत्ति से अर्जित जमीन है उनके जमीनों को जरुरत मंदों में बराबर बाँट दिया जाय। यदि किसी जमींदार के घर कोई नौकरी करने वाला नहीं है तो उसके घर के किसी व्यक्ति को तभी नौकरी में आरक्षण दिया जाय। जब उसकी जमीं जरुरत मंदों में बँटी  हो।
७. मंदिरों, मस्जिदों इत्यादि धर्म स्थलों की संपत्ति को विद्यालय और अस्पताल बनाने में व्यय किया जाय. साथ ही इन धार्मिक स्थलों को किसी एक जाति विशेष के स्वामित्व से मुक्त किया जाय।
 अंत में यह व्यवस्था एक साथ एक समय में ततकाल रूप से लागु किया जाय और समाज द्वारा सहर्ष स्वीकार किया जाय। वरना कमजोरों और पिछड़ों को जाति के आधार पर मिलने वाली आरक्षण व्यवस्था पर ऊँगली उठाना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता

Thursday, August 27, 2015

फिर ये जगत माता कैसे?

बचपन से काली, दुर्गा, सरस्वती इत्यादि काल्पनिक देवियों के बारे में सुनते आया हूँ कि ये सभी जगत माता हैं अर्थात सम्पूर्ण संसार की माँ। भला यह कैसे संभव है कि इस संसार की एक से अधिक माँ हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये संसार के अलग-अलग क्षेत्रों, जीवोँ एवम् उसकी परिस्थितिकी के जन्म की कारक हैं। यदि ऐसा है तो फिर ये जगत माता कैसे?
खैर छोड़िये इन बातों को। इनमे ऐसा कुछ नहीं जिसे तवज्जु दिया जाय। कुछ फते की बात किया जाय और वह यह है कि क्या एक माँ बर्दाश्त कर सकती हैं कि उसी के सामने उसके... नाम पर उसके किसी पुत्र की बलि दी जाय? हो सकता है कि संसार में ढूढ़ने पर ऐसी उलटी खोपड़ी की एक की जगह हजार मिल जाय। क्योंकि संसार विभिन्नताओं का नाम है। परंतु ये तो जगत माता हैं अर्थात पुरे संसार की माँ। फिर,क्या यह संभव है कि जगत माता के सामने कोई उसके पुत्रों की बलि उसी के नाम पर दे और वह उसे हँसी-खुँसी स्वीकार करें। इतना ही नहीं, वह प्रसन्न होकर बलि चढाने वाले अन्य पुत्रों को ख़ुशी, सम्पन्नता और तृष्णाओं की पूर्ति का बलिदान दे। यक़ीनन कोई भी विवेकशील या तर्कशील व्यक्ति या विकासशील समाज इस कड़वे सत्य को स्वीकार नहीं कर सकता कि कोई जगत माता अपने पुत्रों की बलि लेगी। फिर तो बलि प्रथा को लेकर लोगों की आस्था झूठी है या फिर यह जगत माता या फिर दोनों। वरना जिस माता की शक्तियों की गुणगान करते वेद, पुराण एवम् भक्तों की मुर्ख फ़ौज नहीं थकती। वह माता निरपराध, बेजुबान एवम् मासूम पशुओं की बलि पर पत्थर नहीं बनी रहती। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये जगत माताएं केवल मनुष्यों की है, पशुओं की नहीं। फिर ये जगत माता कैसे हो सकती हैं? यह तो कोई अफवाह है जो डर, स्वार्थ एवम् अज्ञानतावश मूर्खों ने फैलायी है।.............सूफी ध्यान श्री|

Sunday, August 23, 2015

यह जो मैं हूँ मैं होकर भी नहीं


१. 
यह जो मैं हूँ 
मैं होकर भी
मैं नहीं।
मैं के होने से मैं हूँ 
तो फिर मैं कौन हूँ?

जबकि बस मैं ही हूँ
अब मैं होकर भी
मैं नहीं हूँ।
यह
सजा 
मैं का होने का
कि मैं होकर भी
मैं न रहा।
मैं की खातिर
जिस मैं को भुलाया मैं।
आज उसी मैं की
जरुरत है मुझे।
अब मैं होकर भी
मैं नहीं हूँ।



२. 
कमबख्त किसको पड़ी है कुछ होने की यहाँ
जब कुछ न होकर ही बहुत कुछ है "अलीन"।
३. 
अभी तक जिन्दा हूँ जो कहता हूँ कि मैं मर गया।
४. 
खुद का भ्रम बहुत है ख़ुदा के होने के लिए।
ख़ुदा का भ्रम पैदा न कर खुद के होने के लिए
..........अनिल कुमार 'अलीन' ........

वो जो पत्थरों में प्राण फुँकते हैं

मूर्तिपूजकों की मान्यताओं में एक हास्यपद चीज देखी जाती है। वह यह कि किसी मंदिर में देवी-देवता/ ईश्वर की मूर्ति की स्थापना से पूर्व बकायदा रीति-रिवाजों के साथ तंत्र-मन्त्रों से इन बेजान पत्थरों में प्राण-प्रतिष्ठा करते  है। भाई यह तो कमाल की घटना है। एक तरफ कहना कि ईश्वर जीवोँ में प्राण फूँकता है। दूसरी तरफ लोग निर्जीवों (पत्थरों) में प्राण फूँक रहे हैं और वह भी ईश्वर का प्राण। अर्थात वे लोग तो उस ईश्वर से भी श्रेष्ठ है जिसे वे खुद से श्रेष्ठ बताते हैं। फिर तो उनकी अपने ईश्वर को निचा दिखाने की कोशिश नहीं तो और क्या है? उनका ईश्वर जिन पत्थरों में प्राण नहीं फूँक सकता, उन पत्थरों में वे लोग उसी का प्राण फूँक रहे हैं। वह कितना बेहाया और बेशर्म है कि इतने जिल्लते सहने के बाद भी मुर्ख मानवों के मन-मस्तिष्क में जिन्दा रहता हैं। उससे भी कहीं ज्यादा बेहाया और बेशर्म वे लोग है जो खुद तो मर जाते हैं। परंतु ईश्वर को अपने पीढ़ियों के मन-मस्तिष्क में स्थानांतरण कर देते हैं ताकि उससे श्रेष्ठता की होड़ चलती रहे हैं। आख़िरकार यह कैसी मूर्खता है कि भोजन रहते हुए भी कोई भूखा मरे जा रहा हैं, पानी रहते हुए भी कोई प्यासा मरे जा रहा हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ईश्वर मानवों की दया की बदौलत जिन्दा रहता हैं या फिर हम मानवों का डर है कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो ईश्वर मर जायेगा। भाई यहाँ तो बड़ा कंफ्यूज़न है। समझ में ही नहीं आता कि बंदा कौन है और ख़ुदा कौन है? प्राण-प्रतिष्ठा कला का ज्ञान होते हुए भी लोगों के प्राण-पखेरू उड़े जा रहे हैं और मानव मन प्राण-प्रतिष्ठा कला ज्ञान होते हुए भी मौन पड़ा हुआ है।कोई आस्तिक या नास्तिक यह न समझे कि मैं किसी की आलोचना या समर्थन कर रहा हूँ। अतः किसी को नाराज या खुश होने की जरुरत नहीं। बस आस्तिक भाइयों से इतनी विनती है कि यदि आप लोग सचमुच सक्षम हो तो इस प्रकार के वाहियात कार्यों को करके अपने शक्ति का दुरूपयोग क्यों? निर्जीवों  को जीवन देने से कहीं बेहतर होगा कि जीवोँ को जीवन देते। आये दिन लाखों लोग वक्त के मार से कहीं सडकों पर, कहीं अस्पतालों में, किसी के आँखों के सामने तो किसी के आँखों से दूर मरे रहे हैं। चारो तरफ दुःख और पीड़ा से मानव मन तपते रेगिस्तान की भाँति व्यथित है। कहीं माँ-बाप से उनके आँखों का तारा तो कहीं किसी संतान से बचपन का सहारा, कहीं किसी से बहन तो कहीं किसी से भाई, कहीं किसी से सुहाग तो कहीं किसी से लुगाई, कहीं किसी से हँसी तो कहीं किसी से रुलाई; न चाह कर भी छूटते रहते हैं और ऐसे में आँखों के अश्क, असहाय हो बहते रहते हैं। मानव-मन व्यथित है और आँखें आँसुओं में भी डूबकर कर प्यासी है। ऐसे नाजुक हालात में इंसानों को छोड़कर पत्थरों में प्राण प्रतिष्ठा करना मूर्खता नहीं तो क्या है?......अनिल कुमार 'अलीन'