Monday, March 3, 2014

यांत्रिकी और मैं



 
किसी पेंडुलम की भांति,
एक ही गति की पुनरावृति होती है,
एक आवर्ती गति
जिसके यांत्रिकी से बंधे,
चला जाता हूँ.
घर से ऑफिस व ऑफिस से घर,
यांत्रिकी जो टूटने का नाम नहीं लेती,
जो परिणाम है:
मेरी आशाओं, अभिलाषाओं का.
घर पर इंतज़ार हैं,
एक माँ को अपने बेटे का,
एक बीबी को अपने शौहर का,
एक नन्ही सी जान का अपने पिता का.
इन सबके बीच गुजरने वाला पल,
अनमोल है, अतुल्य है, अद्वितीय है
और निश्चय ही मुक्त है यांत्रिकता से,
जो जीवन राग सुनाता है.
ठहरता रहता हैं,
मेरे जहन में संस्मरण बनकर,
जिसे कभी भुलाना नहीं चाहता
और जिसे छोड़ जाना चाहता हूँ,
इन पलों की यादें आने वाले पलों के लिए
ताकि आने वाली पीढ़ी के साथ जिन्दा रहूँ.
पर सोचता हूँ,
जब यह यांत्रिकता टूटेगी  सदा के लिए,
तब क्या कोई साक्षी रहेगा इन पलों का.
वो पल जिसमे मैं न रहूँगा,
और न ही मेरे अपने रहेंगे,
न तुम रहोगे और न तुम्हारी दुनिया.
ये जमीं और आसमान,
चाँद-सितारे, आकाश गंगाएं:
यहाँ तक कि ब्रह्माण्ड भी न होगा,
आखिर कौन साक्षी होगा
मेरे होने और न होने का?
यह मूलभूत प्रश्न उठता
कुछ पल के लिए मेरे सीने में
और अगले पल वही यांत्रिकी
जिससे बंधा चला जाता हूँ.

4 comments:

  1. यांत्रिक जीवन में जीवन्तता के दो पल भी मायने रखते हैं...खूबसूरत अभिव्यक्ति...

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  2. शुक्रिया श्रीमान............

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  3. शुक्रिया!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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